Breaking News

क्या अब पहली क्लास से पढ़ाई जाएगी सेक्स एजुकेशन? सुप्रीम कोर्ट में सरकार के बड़े संकेत से देशभर में मची हलचल

 


भारत की स्कूली शिक्षा व्यवस्था में जल्द ही एक बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में संकेत दिया है कि देशभर के स्कूलों और कॉलेजों में उम्र के अनुसार सेक्स एजुकेशन (यौन शिक्षा) लागू करने को लेकर वह तैयार है। सरकार ने अदालत को बताया कि इस विषय पर गठित विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट स्वीकार कर ली गई है और सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी मिलने के बाद उसकी सिफारिशों को लागू किया जा सकता है।

हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि देशभर के सभी स्कूलों में तुरंत सेक्स एजुकेशन शुरू करने का अंतिम आदेश अभी जारी नहीं हुआ है। फिलहाल मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है और अदालत की अंतिम मंजूरी तथा सरकार की औपचारिक अधिसूचना के बाद ही इसे लागू किया जाएगा।

सुप्रीम कोर्ट में क्या कहा केंद्र सरकार ने?

मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ऐश्वर्या भाटी ने बताया कि सरकार विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट से सहमत है। अदालत की स्वीकृति मिलने के बाद सरकार पूरे देश में आवश्यक दिशा-निर्देश लागू करने के लिए तैयार है।

यह मामला पॉक्सो (POCSO) कानून से जुड़े एक प्रकरण की सुनवाई के दौरान सामने आया। सुनवाई कर रही पीठ में जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन शामिल हैं। अदालत ने किशोरों के अधिकार, गोपनीयता और यौन शिक्षा की आवश्यकता को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की।

क्यों उठी सेक्स एजुकेशन की जरूरत?

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि आज के समय में अधिकांश बच्चे इंटरनेट, सोशल मीडिया और दोस्तों के माध्यम से यौन संबंधों से जुड़ी अधूरी या गलत जानकारी प्राप्त करते हैं। इसके कारण कई तरह की गलतफहमियां पैदा होती हैं और कई बार बच्चे गंभीर कानूनी और सामाजिक समस्याओं में भी फंस जाते हैं।

अदालत का मानना है कि यदि बच्चों को उनकी उम्र के अनुसार वैज्ञानिक और सही जानकारी स्कूल स्तर पर दी जाए, तो वे अपने शरीर, स्वास्थ्य, सुरक्षा और कानून के बारे में बेहतर समझ विकसित कर सकेंगे।

पॉक्सो कानून को लेकर सुप्रीम कोर्ट की चिंता

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पॉक्सो कानून बच्चों को यौन शोषण से बचाने के लिए बनाया गया था, लेकिन कई मामलों में इसका उपयोग किशोरों के आपसी सहमति वाले संबंधों पर भी हो रहा है।

अदालत ने कहा कि 15 से 18 वर्ष की आयु ऐसा समय होता है, जब बच्चों में शारीरिक और मानसिक बदलाव तेजी से होते हैं। कई बार किशोर-किशोरियां आपसी सहमति से संबंध बनाते हैं या घर छोड़कर शादी कर लेते हैं। ऐसे मामलों में परिवार सम्मान का हवाला देकर लड़के के खिलाफ पॉक्सो का मामला दर्ज करा देता है।

इसका परिणाम यह होता है कि कई नाबालिग लड़कों को जेल जाना पड़ता है और उनका भविष्य प्रभावित होता है। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि सही समय पर जागरूकता और उचित शिक्षा इस तरह की परिस्थितियों को काफी हद तक रोक सकती है।

क्या होगा नए सिलेबस में?

विशेषज्ञ समिति ने सुझाव दिया है कि यौन शिक्षा को उम्र के अनुसार अलग-अलग स्तरों पर पढ़ाया जाए।

प्राइमरी कक्षाओं में बच्चों को शरीर के अंगों की पहचान, व्यक्तिगत स्वच्छता, सुरक्षित और असुरक्षित स्पर्श (Good Touch-Bad Touch) तथा स्वयं की सुरक्षा के बारे में जानकारी दी जाएगी।

मिडिल और हाई स्कूल स्तर पर किशोरावस्था में होने वाले शारीरिक और मानसिक बदलाव, भावनात्मक विकास, सम्मानजनक व्यवहार, सहमति (Consent), लैंगिक समानता, ऑनलाइन सुरक्षा और प्रजनन स्वास्थ्य जैसे विषय शामिल किए जा सकते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि इससे बच्चों को सही जानकारी समय पर मिल सकेगी और वे भ्रम तथा गलत सूचनाओं से बच सकेंगे।

NCERT तैयार करेगा नया पाठ्यक्रम

समिति ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के अनुरूप राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (NCERT) को नया पाठ्यक्रम तैयार करने की सिफारिश की है।

सिलेबस पूरी तरह उम्र के अनुरूप होगा ताकि छोटे बच्चों को केवल उनकी समझ के अनुसार बुनियादी जानकारी मिले, जबकि बड़ी कक्षाओं में विषय को वैज्ञानिक और जिम्मेदार तरीके से पढ़ाया जाए।

हफ्ते में दो बार लग सकती है विशेष कक्षा

समिति की सिफारिशों के अनुसार प्रत्येक स्कूल में प्रशिक्षित शिक्षक या विशेषज्ञ नियुक्त किया जा सकता है, जो सप्ताह में कम से कम दो बार लगभग 15 से 20 मिनट की विशेष कक्षा ले।

इन कक्षाओं का उद्देश्य केवल यौन संबंधों की जानकारी देना नहीं होगा, बल्कि बच्चों को सुरक्षित व्यवहार, सम्मानजनक रिश्तों, मानसिक स्वास्थ्य और व्यक्तिगत सुरक्षा के बारे में जागरूक करना होगा।

माता-पिता और शिक्षकों को भी मिलेगा प्रशिक्षण

समिति का मानना है कि केवल बच्चों को पढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। समाज में इस विषय को लेकर मौजूद झिझक को समाप्त करने के लिए अभिभावकों और शिक्षकों को भी प्रशिक्षित करना आवश्यक होगा।

इसके लिए विशेष ओरिएंटेशन कार्यक्रम आयोजित किए जाने का सुझाव दिया गया है ताकि परिवार और स्कूल दोनों मिलकर बच्चों को सही मार्गदर्शन दे सकें।

विशेषज्ञ समिति में कौन-कौन शामिल था?

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद केंद्र सरकार ने 26 सदस्यीय राष्ट्रीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया था।

इस समिति का नेतृत्व महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव ने किया। समिति में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) के विशेषज्ञ, क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट, शिक्षा विशेषज्ञ तथा विभिन्न मंत्रालयों के प्रतिनिधि शामिल थे।

समिति को यह जिम्मेदारी दी गई थी कि वह किशोरों के अधिकारों की रक्षा, पॉक्सो कानून के प्रभाव और जागरूकता बढ़ाने के लिए व्यावहारिक सुझाव तैयार करे।

सेक्स एजुकेशन क्यों माना जा रहा है जरूरी?

विशेषज्ञों के अनुसार सही यौन शिक्षा के कई सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं।

सबसे पहले, बच्चों को 'गुड टच' और 'बैड टच' की जानकारी मिलने से वे किसी भी गलत हरकत की पहचान जल्दी कर पाते हैं और समय रहते अपने अभिभावकों या शिक्षकों को बता सकते हैं।

दूसरा, किशोरावस्था में होने वाले शारीरिक और मानसिक बदलावों को लेकर बच्चों के मन में जो डर या भ्रम होता है, वह कम हो सकता है।

तीसरा, इंटरनेट पर उपलब्ध गलत और भ्रामक जानकारी से बचाव संभव होगा।

चौथा, किशोरों को सहमति, कानून और जिम्मेदार व्यवहार की समझ विकसित होगी, जिससे भविष्य में कानूनी विवादों की संभावना भी कम हो सकती है।

अंतरराष्ट्रीय अनुभव क्या कहते हैं?

अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों के अनुसार जिन देशों में वैज्ञानिक और उम्र के अनुसार सेक्स एजुकेशन दी जाती है, वहां किशोर गर्भधारण की दर अपेक्षाकृत कम देखी गई है।

विशेषज्ञों का कहना है कि सही जानकारी मिलने से किशोर अधिक जिम्मेदार निर्णय लेते हैं और स्वास्थ्य संबंधी जोखिम भी कम होते हैं।

भारत में क्या स्थिति है?

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (NFHS-5) के अनुसार 15 से 24 वर्ष आयु वर्ग के युवाओं में यौन और प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़ी पर्याप्त जानकारी रखने वालों की संख्या अभी भी काफी कम है।

वहीं विशेषज्ञों का कहना है कि किशोरों में जागरूकता की कमी के कारण कई बार गलत धारणाएं, असुरक्षित व्यवहार और मानसिक तनाव जैसी समस्याएं सामने आती हैं।

पॉक्सो मामलों को लेकर भी उठे सवाल

सुनवाई के दौरान यह मुद्दा भी सामने आया कि पॉक्सो कानून के अंतर्गत दर्ज कई मामलों में बाद में यह पाया गया कि वे किशोरों के आपसी संबंधों से जुड़े थे।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रत्येक मामले में परिस्थितियों को समझना जरूरी है ताकि कानून का उद्देश्य—बच्चों को यौन शोषण से बचाना—कमजोर न हो और निर्दोष किशोरों का भविष्य भी प्रभावित न हो।

अभी क्या है आगे की प्रक्रिया?

फिलहाल यह मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। केंद्र सरकार ने विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट स्वीकार करने की जानकारी दी है, लेकिन देशभर में सेक्स एजुकेशन लागू करने का अंतिम निर्णय अदालत की आगे की सुनवाई और सरकार की औपचारिक अधिसूचना के बाद ही प्रभावी होगा।

यदि अदालत विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों पर सहमति देती है, तो आने वाले समय में एनसीईआरटी नया पाठ्यक्रम तैयार कर सकता है और चरणबद्ध तरीके से देश के स्कूलों में उम्र आधारित यौन शिक्षा शुरू की जा सकती है।

इस पूरे घटनाक्रम को शिक्षा व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। समर्थकों का मानना है कि वैज्ञानिक और संतुलित यौन शिक्षा बच्चों को सुरक्षित, जागरूक और जिम्मेदार नागरिक बनने में मदद करेगी, जबकि कुछ सामाजिक संगठनों का मानना है कि इसके क्रियान्वयन में सांस्कृतिक और पारिवारिक संवेदनशीलताओं का भी पूरा ध्यान रखा जाना चाहिए। अब सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले और उसके बाद सरकार द्वारा उठाए जाने वाले अगले कदमों पर टिकी हैं।

कोई टिप्पणी नहीं